हम मुसलमान अपने ही आलिमों की नज़र मैं...?
"एस एम फ़रीद भारतीय"
जब भी हमारे आलिम ब्यान देते हैं मुसलमानों पर हो रहे ज़ुल्म के बारे में तो वो अकसर एक बात ज़रूर कहते हैं "ये सब हमारे आमाल की सज़ा है नमाज़ पढ़ो और रोज़े रखो" पर कभी ये नहीं बताते कि ज़ुल्म के खिलाफ लड़ने के लिए इस्लाम ने कौनसा तरीक़ा बताया है।
तब क्या आसमान से नोटों की बारिश शुरू हो जाती है ? नहीं हमे दुआ के बाद दुकान, ऑफिस, नौकरी या कारखाने जाकर रोज़ी में बरकत के लिए मेहनत करनी पड़ती है. तब जाकर हमे रोज़ी मिलती है, इसी तरह ज़ुल्म के ख़ातमें के लिए दोनों काम ज़रूरी है नमाज़, रोज़ा और ज़ालिम का मुकाबला...!
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) ने फरमाया "उंट को बांधो और अल्लाह पर तवक्कल करो, "उंट" को खुला छोड़कर अल्लाह पर तवक्कल करने को नहीं कहा
नमाज़ पढ़ना ज़रूरी है लेकिन ज़ालिम के ख़िलाफ़ जुल्म से लड़ने की कोशिश भी जरूरी है* क्यूंकि नमाज़ तो जंग में भी पढ़ना फ़र्ज़ है.
याद रखो अगर मुसल्ले पर ही सारे मसले हल हो जाते तो अल्लाह के रसूल (सअव) और सहाबा (रजि) कभी मैदाने जंग में हाथ मैं तलवार लेकर ना उतरते, दस हज़ार के मुताबिक 313 ना होते.
क्यूंकि आप (सअव) से बढ़कर दुआ किसी की नहीं, लब पर आने से पहले कबूल हो जाती.
अल्लाह ने क़ुरआन में फ़रमाया है "जो क़ौम ख़ुद के हालत ना बदलना चाहे अल्लाह भी उस क़ौम की हालत नहीं बदलता"
हज़रत अली का एक कौल है* रजि०
जो कौम ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठाती वो क़ौम सिर्फ़ लाशें ही उठाती है, हम मुसलमानों को ये आयत और कौल का मतलब इस वक़्त अच्छे से समझने की ज़रूरत है.
*!ख़िदमतुल मुस्लिमीन ए हिंद!*
आपके साथ का मुंतज़िर...?
+919808123436
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